Monday, 19 September 2022

बाली

 बाली को ब्रम्हा जी से ये वरदान प्राप्त हुआ की, 'जो भी उससे युद्ध करने उसके सामने आएगाउसकी आधी ताक़त बाली के शरीर मे चली जायेगीऔर इससे बाली हर युद्ध मे अजेय रहेगा!'

सुग्रीवबाली दोनों ब्रम्हा के औरस ( वरदान द्वारा प्राप्त ) पुत्र हैं! और ब्रम्हा जी की कृपा बाली पर सदैव बनी रहती है! बाली को अपने बल पर बड़ा घमंड था! उसका घमंड तब ओर भी बढ़ गयाजब उसने करीब करीब तीनों लोकों पर विजय पाए हुए रावण से युद्ध किया और रावण को अपनी पूँछ से बांध कर छह महीने तक पूरी दुनिया घूमी!
रावण जैसे योद्धा को इस प्रकार हरा कर बाली के घमंड की कोई सीमा न रहा! अब वो अपने आपको संसार का सबसे बड़ा योद्धा समझने लगा था! और यही उसकी सबसे बड़ी भूल हुई!
अपने ताकत के मद में चूर एक दिन एक जंगल मे पेड़ पौधों को तिनके के समान उखाड़ फेंक रहा था! हरे भरे वृक्षों को तहस नहस कर दे रहा था! अमृत समान जल के सरोवरों को मिट्टी से मिला कर कीचड़ कर दे रहा था! एक तरह से अपने ताक़त के नशे में बाली पूरे जंगल को उजाड़ कर रख देना चाहता था! और बार बार अपने से युद्ध करने की चेतावनी दे रहा था, "है कोई जो बाली से युद्ध करने की हिम्मत रखता हो! है कोई जो बाली से युद्ध करके बाली को हरा दे!" इस तरह की गर्जना करते हुए बाली जंगल को तहस नहस कर रहा था!
संयोग वश उसी जंगल के बीच मे हनुमान जी राम नाम का जाप करते हुए तपस्या में बैठे थे! बाली की इस हरकत से हनुमान जी को राम नाम का जप करने में विघ्न लगा! और हनुमान जी बाली के सामने जाकर बोले, "हे वीरों के वीरहे ब्रम्ह अंशहे राजकुमार बाली! ( तब बाली किष्किंधा के युवराज थे) क्यों इस शांत जंगल को अपने बल की बलि दे रहे हो, हरे भरे पेड़ों को उखाड़ फेंक रहे होफलों से लदे वृक्षों को मसल दे रहे होअमृत समान सरोवरों को दूषित मलिन मिट्टी से मिला कर उन्हें नष्ट कर रहे हो? इससे तुम्हे क्या मिलेगा? तुम्हारे औरस पिता ब्रम्हा के वरदान स्वरूप कोई तुम्हे युद्ध मे नही हरा सकताक्योंकि जो कोई तुमसे युद्ध करने आएगाउसकी आधी शक्ति तुममे समाहित हो जाएगी! इसलिए हे कपि राजकुमार, अपने बल के घमंड को शांत करऔर राम नाम का जाप कर! इससे तेरे मन में अपने बल का भान नही होगाऔर राम नाम का जाप करने से ये लोक और परलोक दोनों ही सुधर जाएंगे!"
इतना सुनते ही बाली अपने बल के मद चूर हनुमान जी से बोला, "ए तुच्छ वानरतू हमें शिक्षा दे रहा हैराजकुमार बाली को! जिसने विश्व के सभी योद्धाओं को धूल चटाई है, और जिसके एक हुंकार से बड़े से बड़ा पर्वत भी खंड खंड हो जाता है! जा तुच्छ वानरजा और तू ही भक्ति कर अपने राम नाम की, और जिस राम की तू बात कर रहा हैवो है कौन? और केवल तू ही जानता है राम के बारे में! मैंने आजतक किसी के मुँह से ये नाम नही सुना! और तू मुझे राम नाम जपने की शिक्षा दे रहा है!"
हनुमान जी ने कहा, "प्रभु श्री रामतीनो लोकों के स्वामी हैउनकी महिमा अपरंपार हैये वो सागर है जिसकी एक बूंद भी जिसे मिले वो भवसागर को पार कर जाए!"
बाली: "इतना ही महान है राम तो बुला ज़रा! मैं भी तो देखूं कितना बल है उसकी भुजाओं में!" 
बाली को भगवान राम के विरुद्ध ऐसे कटु वचन हनुमान जो को क्रोध दिलाने के लिए पर्याप्त थे!
हनुमान- "ए बल के मद में चूर बाली, तू क्या प्रभु राम को युद्ध मे हराएग! पहले उनके इस तुच्छ सेवक को युद्ध में हरा कर दिखा!"
बाली-  "तब ठीक है कल के कल नगर के बीचों बीच तेरा और मेरा युद्ध होगा!"
हनुमान जी ने बाली की बात मान ली!
बाली ने नगर में जाकर घोषणा करवा दिया कि कल नगर के बीच हनुमान और बाली का युद्ध होगा!
अगले दिन तय समय पर जब हनुमान जी बाली से युद्ध करने अपने घर से निकलने वाले थेतभी उनके सामने ब्रम्हा जी प्रकट हुए! हनुमान जी ने ब्रम्हा जी को प्रणाम किया और बोले, "हे जगत पिता आज मुझ जैसे एक वानर के घर आपका पधारने का कारण अवश्य ही कुछ विशेष होगा!"
ब्रम्हा जी बोले, "हे अंजनीसुतहे शिवांशहे पवनपुत्रहे राम भक्त हनुमान! मेरे पुत्र बाली को उसकी उद्दंडता के लिए क्षमा कर दोऔर युद्ध के लिए न जाओ!"
हनुमान जी ने कहा, "हे प्रभु! बाली ने मेरे बारे में कहा होता तो मैं उसे क्षमा कर देता! परन्तु उसने मेरे आराध्य श्री राम के बारे में कहा है जिसे मैं सहन नही कर सकता! और मुझे युद्ध के लिए चुनौती दिया है! जिसे मुझे स्वीकार करना ही होगा! अन्यथा सारी विश्व मे ये बात कही जाएगी कि हनुमान कायर है जो ललकारने पर युद्ध करने इसलिए नही जाता है क्योंकि एक बलवान योद्धा उसे ललकार रहा है!"
तब कुछ सोंच कर ब्रम्हा जी ने कहा, "ठीक है हनुमान जीपर आप अपने साथ अपनी समस्त सक्तियों को साथ न लेकर जाएं! केवल दसवां भाग का बल लेकर जाएं! बाकी बल को योग द्वारा अपने आराध्य के चरणों में रख दे! युद्ध से आने के उपरांत फिर से उन्हें ग्रहण कर लें!"
हनुमान जी ने ब्रम्हा जी का मान रखते हुए वैसे ही किया और बाली से युद्ध करने घर से निकले!
उधर बाली नगर के बीच मे एक जगह को अखाड़े में बदल दिया था और हनुमान जी से युद्ध करने को व्याकुल होकर बार बार हनुमान जी को ललकार रहा था! पूरा नगर इस अदभुत दो महायोद्धाओं के युद्ध को देखने के लिए जमा था! 
हनुमान जी जैसे ही युद्ध स्थल पर पहुँचेबाली ने हनुमान को अखाड़े में आने के लिए ललकारा! ललकार सुन कर जैसे ही हनुमान जी ने एक पावँ अखाड़े में रखा, उनकी आधी शक्ति बाली में चली गई! बाली में जैसे ही हनुमान जी की आधी शक्ति समाईबाली के शरीर मे बदलाव आने लगेउसके शरीर मे ताकत का सैलाब आ गयाबाली का शरीर बल के प्रभाव में फूलने लगाउसके शरीर से फट कर खून निकलने लगा! 
बाली को कुछ समझ नही आ रहा था! तभी ब्रम्हा जी बाली के पास प्रकट हुए और बाली को कहा, "पुत्र जितना जल्दी हो सके यहां से दूर अति दूर चले जाओबाली को इस समय कुछ समझ नही आ रहा था! वो सिर्फ ब्रम्हा जी की बात को सुना और सरपट दौड़ लगा दिया!
सौ मील से ज्यादा दौड़ने के बाद बाली थक कर गिर गया! कुछ देर बाद जब होश आया तो अपने सामने ब्रम्हा जी को देख कर बोला, "ये सब क्या हैहनुमान से युद्ध करने से पहले मेरा शरीर का फटने की हद तक फूलना, फिर आपका वहां अचानक आना और ये कहना कि वहां से जितना दूर हो सके चले जाओमुझे कुछ समझ नही आया?"
ब्रम्हा जी बोले, "पुत्र जब तुम्हारे सामने हनुमान जी आयेतो उनका आधा बल तुममे समा गयातब तुम्हे कैसा लगा?"
बाली- मुझे ऐसा लग जैसे मेरे शरीर में शक्ति की सागर लहरें ले रही है ऐसे लगा जैसे इस समस्त संसार मे मेरे तेज़ का सामना कोई नही कर सकता! पर साथ ही साथ ऐसा लग रहा था जैसे मेरा शरीर अभी फट पड़ेगा!"
ब्रम्हा जो बोले, "हे बालीमैंने हनुमान जी को उनके बल का केवल दसवां भाग ही लेकर तुमसे युद्ध करने को कहापर तुम तो उनके दसवें भाग के आधे बल को भी नही संभाल सके! सोचोयदि हनुमान जी अपने समस्त बल के साथ तुमसे युद्ध करने आते तो उनके आधे बल से तुम उसी समय फट जाते जब वो तुमसे युद्ध करने को घर से निकलते!"
इतना सुन कर बाली पसीना पसीना हो गया! और कुछ देर सोच कर बोला, "प्रभुयदि हनुमान जी के पास इतनी शक्तियां है तो वो इसका उपयोग कहाँ करेंगे?"
ब्रम्हा- "हनुमान जी कभी भी अपने पूरे बल का प्रयोग नही कर पाएंगेक्योंकि ये पूरी सृष्टि भी उनके बल के दसवें भाग को नही सह सकती!"
ये सुन कर बाली ने वही हनुमान जी को दंडवत प्रणाम किया और बोला, "जो हनुमान जी जिनके पास अथाह बल होते हुए भी शांत और रामभजन गाते रहते है और एक मैं हूँ जो उनके एक बाल के बराबर भी नही हूँ और उनको ललकार रहा था, मुझे क्षमा करें!"
और आत्मग्लानि से भर कर बाली ने राम भगवान का तप किया और अपने मोक्ष का मार्ग उन्ही से प्राप्त किया.
तो बोलोपवनपुत्र हनुमान की जयजय श्री राम जय श्री राम!
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Unseen Poem: English: Part 3

 

Vande Matram! In exams we have to solve unseen poem question. Here is one for you.

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Credit: Hitavada Twinkle Star, Poet: Shriya Mukund Seikdar

Poem

Money can buy a clock, but not time.

Money can buy a palace, but not people.

Money can buy cosmetics but not beauty.

Money can buy books but not wisdom.

Money can buy glasses but not vision.

Money can buy glasses, but not creativity.

Money can buy canvas, but not art.

Heart can be implanted love can’t be.

 

Read the above poem carefully and write the answers of the following questions.

Q1) Give title to this poem?

Ans. __________________

Q2) What you can buy from money? Enlist from poem.

Ans. _________________

Q3) What you can not buy from money?

Ans. __________________

Q4) If you are having a handsome amount of money in your hand then which three things you will do?

Ans. ___________________

Q5) What is moral of this poem?

Ans. _________________________

 

Note: This poem can be written in an essay on “If I have huge money to spend”.

Share this unseen poem for practice with all students. Comment your answers.

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सत्संग का फल

  

एक था मजदूर। मजदूर तो था, साथ-ही-साथ किसी संत महात्मा का प्यारा भी था। सत्संग का प्रेमी था। उसने शपथ खाई थी! मैं उसी का बोझ उठाऊँगा, उसी की मजदूरी करूँगा, जो सत्संग सुने अथवा मुझे सुनाये. प्रारम्भ में ही यह शर्त रख देता था। जो सहमत होता, उसका काम करता।

एक बार कोई सेठ आया तो इस मजदूर ने उसका सामान उठाया और सेठ के साथ वह चलने लगा। जल्दी-जल्दी में शर्त की बात करना भूल गया। आधा रास्ता कट गया तो बात याद आ गई। उसने सामान रख दिया और सेठ से बोला:- “सेठ जी ! मेरा नियम है कि मैं उन्हीं का सामान उठाऊँगा, जो कथा सुनावें या सुनें। अतः आप मुझे सुनाओ या सुनो।

सेठ को जरा जल्दी थी। वह बोला- “तुम ही सुनाओ।” मजदूर के वेश में छुपे हुए संत की वाणी से कथा निकली। मार्ग तय होता गया। सेठ के घर पहुंचे तो सेठ ने मजदूरी के पैसे दे दिये। मजदूर ने पूछा:- क्यों सेठजी ! सत्संग याद रहा?” “हमने तो कुछ सुना नहीं। हमको तो जल्दी थी और आधे रास्ते में दूसरा कहाँ ढूँढने जाऊँ? इसलिए शर्त मान ली और ऐसे ही ‘हाँ… हूँ…..’ करता आया। हमको तो काम से मतलब था, कथा से नहीं।”

भक्त मजदूर ने सोचा कि कैसा अभागा है ! मुफ्त में सत्संग मिल रहा था और सुना नहीं ! यह पापी मनुष्य की पहचान है। उसके मन में तरह-तरह के ख्याल आ रहे थे. अचानक उसने सेठ की ओर देखा और गहरी साँस लेकर कहा:- “सेठ! कल शाम को सात बजे आप सदा के लिए इस दुनिया से विदा हो जाओगे। अगर साढ़े सात बजे तक जीवित रहें तो मेरा सिर कटवा देना।”

जिस ओज से उसने यह बात कही, सुनकर सेठ काँपने लगा। भक्त के पैर पकड़ लिए। भक्त ने कहा:- “सेठ! जब आप यमपुरी में जाएँगे तब आपके पाप और पुण्य का लेखा जोखा होगा, हिसाब देखा जाएगा। आपके जीवन में पाप ज्यादा हैं, पुण्य कम हैं। अभी रास्ते में जो सत्संग सुना, थोड़ा बहुत उसका पुण्य भी होगा। आपसे पूछा जायेगा कि कौन सा फल पहले भोगना है? पाप का या पुण्य का ? तो यमराज के आगे स्वीकार कर लेना कि पाप का फल भोगने को तैयार हूँ पर पुण्य का फल भोगना नहीं है, देखना है। पुण्य का फल भोगने की इच्छा मत रखना।"

मरकर सेठ पहुँचे यमपुरी में। चित्रगुप्तजी ने हिसाब पेश किया। 

यमराज के पूछने पर सेठ ने कहा:- “मैं पुण्य का फल भोगना नहीं चाहता और पाप का फल भोगने से इन्कार नहीं करता। कृपा करके बताइये कि सत्संग के पुण्य का फल क्या होता है? मैं वह देखना चाहता हूँ।” 

पुण्य का फल देखने की तो कोई व्यवस्था यमपुरी में नहीं थी। पाप- पुण्य के फल भुगताए जाते हैं, दिखाये नहीं जाते। यमराज को कुछ समझ में नहीं आया। ऐसा मामला तो यमपुरी में पहली बार आया था।

यमराज उसे ले गये धर्मराज के पास। धर्मराज भी उलझन में पड़ गये। चित्रगुप्त, यमराज और धर्मराज तीनों सेठ को ले गये। सृष्टि के आदि परमेश्वर के पास । धर्मराज ने पूरा वर्णन किया।

परमपिता मंद-मंद मुस्कुराने लगे। और तीनों से बोले:- “ठीक है. जाओ, अपना-अपना काम सँभालो।” सेठ को सामने खड़ा रहने दिया। सेठ बोला:- “प्रभु ! मुझे सत्संग के पुण्य का फल भोगना नहीं है, अपितु देखना है।”

प्रभु बोले:- “चित्रगुप्त, यमराज और धर्मराज जैसे देव आदरसहित तुझे यहाँ ले आये और तू मुझे साक्षात देख रहा है, इससे अधिक और क्या देखना है?”

एक घड़ी आधी घड़ी,आधी में पुनि आध। तुलसी सत्संग साध की, हरे कोटि अपराध।

जो चार कदम चलकर के सत्संग में जाता है, तो यमराज की भी ताकत नहीं उसे हाथ लगाने की।

सत्संग-श्रवण की महिमा इतनी महान है. सत्संग सुनने से पाप-ताप कम हो जाते हैं। पाप करने की रूचि भी कम हो जाती है। बल बढ़ता है दुर्बलताएँ दूर होने लगती हैं।

Unseen Poem: English: Part 2

 


Vande Matram! In exams we have to solve unseen poem question. Here is one for you.

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Credit: Hitwada Twinkle Star, Poet: Saksham Shrivastava

Poem

A mighty soul

He’s a mighty soul

With a clear goal

He is one of a kind

With a brilliant mind

He has got the power

To ignite young minds

He has got the power to

Turn aspiration into reality

It’s like a staircase

By staying at one place

He is easy to reach

His job is to teach

He is wonderful creature

He is none other that a teacher.

 

Read carefully the poem given above and answer the following.

Q1) Give a title to this poem?

Ans. ___________

Q2) What powers a teacher is having?

Ans. _______________

Q3) Who teaches?

Ans. _____________________

Q4) what qualities of a teacher are mentioned in this poem?

Ans. ______________________

Q5) What is your aspiration? Does your teacher help to turn your aspiration into reality?

Ans. _____________________

 

Note: This poem can be used for essay writing on “My Favourite Teacher”

Share this unseen poem for practice with all students. Comment your answers.

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Patronus Charm

  

There comes a time in everyone’s life when you feel absolutely low. Like there’s nothing more out there than if you had reached the end of the road. Moments when absolute grief engulfs every pore of your body. You feel that there is no reason to live. Moments when absolute grief engulfs every pore of the body. You feel that there is no reason to live. Moments when you feel unloved, moments when you feel that you are just a waste of space on this land.

If you are having such unhappy feelings then one must learn to produce a Patronus charm. For this, you must concentrate on a very happy memory and speak out the incantation. Once we start dwelling on negative thoughts, our mind is filled with grief and pain. We start replaying the sad moments of our life over and over again and become sadder. To fight this negativity you must have to think of a happy moment in your life and you will come out of these blues. But it is difficult to produce a Patronus charm. Because thinking of a good thing during your bad times is certainly a hard job. Here I must add an affirmation, “I always recall all the happy moments of my life.” Practicing this affirmation daily will become your habit and then you will start recalling happy events of your life and make your time full of joy and happiness. Happiness is the state of mind. If you decide to be happy, you will be happy! So what if you failed your test today? Remember the day when you passed it with the desired score.

Don’t bully yourself for your failures. Everyone fails in their life once in a while! Even the earth sees light for only half of the day! There are always going to be dark times. But just remember, happiness can be found even in the darkest of times, only if you remember to turn on the lights.

Thanks for reading till the end. Please share this.

Unseen Poem: English: Part 1

 

Vande Matram! In exams we have to solve unseen poem question. Here is one for you.

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Credit: Hitwada Twinkle Star, Poet: Swara Milind Sohoni

Poem

Happiness can be found in the darkest times.

But one should remember to forget tensity and smile.

Twichiness and worry are all phases of life.

One should work hard and learn from mistakes they've done in life.

Self-rigidity is not the solution, but happiness is.

Think of the moment when time was in your favour.

Savour that moment in your way.

Self confidence is one of the keys to success.

Demotivation is the path to depress.

So, feel the power inside, gain the confidence,

Because happiness can be found in the darkest of times,

But one should forget tensity and smile.

 

Read carefully the poem given above and answer the following question.

Q1) What can be the title of this poem?

Ans. ____________________________

Q2) What is the solution?

Ans. ____________________

Q3) From what one should learn?

Ans. _______________________

Q4) What is the key to success?

Ans. _____________________

Q5) What is path to depress?

Ans. _________________________

Q6) How to gain confidence?

Ans. _______________________

Q7) How to find happiness in darkest of the time?

Ans. ____________________________

Comment your answers and share this unseen poem for practice with all students.

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Saturday, 10 September 2022

गयासुर की कहानी

 

कहते हैं गयासुर की घोर तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान ब्रह्मा ने वर दिया था कि उसकी मृत्यु संसार में जन्म लेने वाले किसी भी व्यक्ति के हाथों नहीं होगी। वर पाने के बाद गयासुर ने तीनों लोकों पर अधिकार कर लिया। वो अत्याचारी हो गया। एक दिन जब वो द्वारका वन से गुजर रहा था तब उसने एक महात्मा को तपस्या करते देखा। थके गयासुर ने अपनी प्यास बुझाने के लिए तपस्वी से उनका रक्त मांगा, लेकिन तपस्वी ने उसे मुक्ति का ज्ञान दिया और मुक्ति के लिए बद्रीनाथ में नारायण के दर्शन के लिए कहा। गयासुर बद्रीनाथ पहुंच गया, लेकिन नारायण को मंदिर में ना पाकर वो उनका कमलासन लेकर उड़ने लगा। इस पर नारायण ने आकाश में ही गयासुर का केश पकड़कर उसे रोक लिया जिस जगह भगवान ने गयासुर को रोका, वो गया के नाम से प्रसिद्ध हो गई।

गयासुर को वर देने से पहले भगवान ने उससे युद्ध भी किया था। उन्होंने पहला प्रहार गदा से किया, लेकिन गयासुर ने उसी कमलासन को आगे कर दिया, जिसे वो बद्रीनाथ से लेकर जा रहा था। आसन का एक टुकड़ा बद्रीनाथ के पास गिरा। यही जगह आज बद्रीनाथ के पास ब्रह्मकपाल नाम से मशहूर है, जहां पितृपक्ष के दौरान लोग पूर्वजों को पिंडदान करते हैं। नारायण के दूसरे वार पर कमलासन का टुकड़ा उस जगह गिरा जहां आज हरिद्वार है। हरिद्वार में ये जगह नारायणी शिला के नाम से मशहूर है। यही वजह है कि पितृ पक्ष में हरिद्वार में भी भारी संख्या में लोग जुटते हैं और अपने पुरखों के लिए पिंडदान करते हैं।

हरिद्वार और बद्रीनाथ में श्राद्ध की महत्ता ठीक वैसी ही है जैसी कि गया की है, क्योंकि नारायण के प्रहार से कमलासन का तीसरा हिस्सा जो गयासुर के पास रह गया था, उसे लेकर वो गया चला आया था। यही जगह विष्णु चरण या विष्णु पाद के नाम से प्रसिद्ध हो गई लेकिन कमलासन के नष्ट हो जाने के बाद गयासुर ने खुद नारायण से मुक्ति की प्रार्थना की। इस पर भगवान ने न सिर्फ उसे मुक्ति दी बल्कि कहा कि जिन तीन जगहों पर उनका कमलासन गिरा है, वहां पूजा करने से मुक्ति मिलेगी। 

बाली

  बाली को ब्रम्हा जी से ये वरदान प्राप्त हुआ   की, 'जो भी उससे युद्ध करने उसके सामने आएगा ,  उसकी आधी ताक़त बाली के शरीर मे चली जायेगी , ...