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Monday, 19 September 2022

सत्संग का फल

  

एक था मजदूर। मजदूर तो था, साथ-ही-साथ किसी संत महात्मा का प्यारा भी था। सत्संग का प्रेमी था। उसने शपथ खाई थी! मैं उसी का बोझ उठाऊँगा, उसी की मजदूरी करूँगा, जो सत्संग सुने अथवा मुझे सुनाये. प्रारम्भ में ही यह शर्त रख देता था। जो सहमत होता, उसका काम करता।

एक बार कोई सेठ आया तो इस मजदूर ने उसका सामान उठाया और सेठ के साथ वह चलने लगा। जल्दी-जल्दी में शर्त की बात करना भूल गया। आधा रास्ता कट गया तो बात याद आ गई। उसने सामान रख दिया और सेठ से बोला:- “सेठ जी ! मेरा नियम है कि मैं उन्हीं का सामान उठाऊँगा, जो कथा सुनावें या सुनें। अतः आप मुझे सुनाओ या सुनो।

सेठ को जरा जल्दी थी। वह बोला- “तुम ही सुनाओ।” मजदूर के वेश में छुपे हुए संत की वाणी से कथा निकली। मार्ग तय होता गया। सेठ के घर पहुंचे तो सेठ ने मजदूरी के पैसे दे दिये। मजदूर ने पूछा:- क्यों सेठजी ! सत्संग याद रहा?” “हमने तो कुछ सुना नहीं। हमको तो जल्दी थी और आधे रास्ते में दूसरा कहाँ ढूँढने जाऊँ? इसलिए शर्त मान ली और ऐसे ही ‘हाँ… हूँ…..’ करता आया। हमको तो काम से मतलब था, कथा से नहीं।”

भक्त मजदूर ने सोचा कि कैसा अभागा है ! मुफ्त में सत्संग मिल रहा था और सुना नहीं ! यह पापी मनुष्य की पहचान है। उसके मन में तरह-तरह के ख्याल आ रहे थे. अचानक उसने सेठ की ओर देखा और गहरी साँस लेकर कहा:- “सेठ! कल शाम को सात बजे आप सदा के लिए इस दुनिया से विदा हो जाओगे। अगर साढ़े सात बजे तक जीवित रहें तो मेरा सिर कटवा देना।”

जिस ओज से उसने यह बात कही, सुनकर सेठ काँपने लगा। भक्त के पैर पकड़ लिए। भक्त ने कहा:- “सेठ! जब आप यमपुरी में जाएँगे तब आपके पाप और पुण्य का लेखा जोखा होगा, हिसाब देखा जाएगा। आपके जीवन में पाप ज्यादा हैं, पुण्य कम हैं। अभी रास्ते में जो सत्संग सुना, थोड़ा बहुत उसका पुण्य भी होगा। आपसे पूछा जायेगा कि कौन सा फल पहले भोगना है? पाप का या पुण्य का ? तो यमराज के आगे स्वीकार कर लेना कि पाप का फल भोगने को तैयार हूँ पर पुण्य का फल भोगना नहीं है, देखना है। पुण्य का फल भोगने की इच्छा मत रखना।"

मरकर सेठ पहुँचे यमपुरी में। चित्रगुप्तजी ने हिसाब पेश किया। 

यमराज के पूछने पर सेठ ने कहा:- “मैं पुण्य का फल भोगना नहीं चाहता और पाप का फल भोगने से इन्कार नहीं करता। कृपा करके बताइये कि सत्संग के पुण्य का फल क्या होता है? मैं वह देखना चाहता हूँ।” 

पुण्य का फल देखने की तो कोई व्यवस्था यमपुरी में नहीं थी। पाप- पुण्य के फल भुगताए जाते हैं, दिखाये नहीं जाते। यमराज को कुछ समझ में नहीं आया। ऐसा मामला तो यमपुरी में पहली बार आया था।

यमराज उसे ले गये धर्मराज के पास। धर्मराज भी उलझन में पड़ गये। चित्रगुप्त, यमराज और धर्मराज तीनों सेठ को ले गये। सृष्टि के आदि परमेश्वर के पास । धर्मराज ने पूरा वर्णन किया।

परमपिता मंद-मंद मुस्कुराने लगे। और तीनों से बोले:- “ठीक है. जाओ, अपना-अपना काम सँभालो।” सेठ को सामने खड़ा रहने दिया। सेठ बोला:- “प्रभु ! मुझे सत्संग के पुण्य का फल भोगना नहीं है, अपितु देखना है।”

प्रभु बोले:- “चित्रगुप्त, यमराज और धर्मराज जैसे देव आदरसहित तुझे यहाँ ले आये और तू मुझे साक्षात देख रहा है, इससे अधिक और क्या देखना है?”

एक घड़ी आधी घड़ी,आधी में पुनि आध। तुलसी सत्संग साध की, हरे कोटि अपराध।

जो चार कदम चलकर के सत्संग में जाता है, तो यमराज की भी ताकत नहीं उसे हाथ लगाने की।

सत्संग-श्रवण की महिमा इतनी महान है. सत्संग सुनने से पाप-ताप कम हो जाते हैं। पाप करने की रूचि भी कम हो जाती है। बल बढ़ता है दुर्बलताएँ दूर होने लगती हैं।

Saturday, 10 September 2022

गयासुर की कहानी

 

कहते हैं गयासुर की घोर तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान ब्रह्मा ने वर दिया था कि उसकी मृत्यु संसार में जन्म लेने वाले किसी भी व्यक्ति के हाथों नहीं होगी। वर पाने के बाद गयासुर ने तीनों लोकों पर अधिकार कर लिया। वो अत्याचारी हो गया। एक दिन जब वो द्वारका वन से गुजर रहा था तब उसने एक महात्मा को तपस्या करते देखा। थके गयासुर ने अपनी प्यास बुझाने के लिए तपस्वी से उनका रक्त मांगा, लेकिन तपस्वी ने उसे मुक्ति का ज्ञान दिया और मुक्ति के लिए बद्रीनाथ में नारायण के दर्शन के लिए कहा। गयासुर बद्रीनाथ पहुंच गया, लेकिन नारायण को मंदिर में ना पाकर वो उनका कमलासन लेकर उड़ने लगा। इस पर नारायण ने आकाश में ही गयासुर का केश पकड़कर उसे रोक लिया जिस जगह भगवान ने गयासुर को रोका, वो गया के नाम से प्रसिद्ध हो गई।

गयासुर को वर देने से पहले भगवान ने उससे युद्ध भी किया था। उन्होंने पहला प्रहार गदा से किया, लेकिन गयासुर ने उसी कमलासन को आगे कर दिया, जिसे वो बद्रीनाथ से लेकर जा रहा था। आसन का एक टुकड़ा बद्रीनाथ के पास गिरा। यही जगह आज बद्रीनाथ के पास ब्रह्मकपाल नाम से मशहूर है, जहां पितृपक्ष के दौरान लोग पूर्वजों को पिंडदान करते हैं। नारायण के दूसरे वार पर कमलासन का टुकड़ा उस जगह गिरा जहां आज हरिद्वार है। हरिद्वार में ये जगह नारायणी शिला के नाम से मशहूर है। यही वजह है कि पितृ पक्ष में हरिद्वार में भी भारी संख्या में लोग जुटते हैं और अपने पुरखों के लिए पिंडदान करते हैं।

हरिद्वार और बद्रीनाथ में श्राद्ध की महत्ता ठीक वैसी ही है जैसी कि गया की है, क्योंकि नारायण के प्रहार से कमलासन का तीसरा हिस्सा जो गयासुर के पास रह गया था, उसे लेकर वो गया चला आया था। यही जगह विष्णु चरण या विष्णु पाद के नाम से प्रसिद्ध हो गई लेकिन कमलासन के नष्ट हो जाने के बाद गयासुर ने खुद नारायण से मुक्ति की प्रार्थना की। इस पर भगवान ने न सिर्फ उसे मुक्ति दी बल्कि कहा कि जिन तीन जगहों पर उनका कमलासन गिरा है, वहां पूजा करने से मुक्ति मिलेगी। 

Friday, 9 September 2022

सीता द्वारा पिण्डदान


'वाल्मीकि रामायण' में सीता द्वारा पिण्डदान देकर दशरथ की आत्मा को मोक्ष मिलने का संदर्भ आता है। वनवास के दौरान भगवान राम, लक्ष्मण और सीता पितृ पक्ष के दौरान श्राद्ध करने के लिए गया धाम पहुँचे। वहाँ श्राद्ध कर्म के लिए आवश्यक सामग्री जुटाने हेतु राम और लक्ष्मण नगर की ओर चल दिए। उधर दोपहर हो गई थी। पिंडदान का समय निकलता जा रहा था और सीता जी की व्यग्रता बढती जा रही थी। अपराह्न में तभी दशरथ की आत्मा ने पिंडदान की माँग कर दी। गया के आगे फल्गु नदी पर अकेली सीताजी असमंजस में पड गई। उन्होंने फल्गू नदी के साथ वट वृक्ष, केतकी के फूल और गाय को साक्षी मानकर बालू का पिंड बनाकर स्वर्गीय राजा दशरथ के निमित्त पिंडदान दे दिया। थोड़ी देर में भगवान राम और लक्ष्मण लौटे तो उन्होंने कहा कि समय निकल जाने के कारण मैंने स्वयं पिंडदान कर दिया।

बिना सामग्री के पिंडदान कैसे हो सकता है? इसके लिए राम ने सीता से प्रमाण माँगा। तब सीताजी ने कहा कि- "यह फल्गू नदी की रेत केतकी के फूल, गाय और वट वृक्ष मेरे द्वारा किए गए श्राद्धकर्म की गवाही दे सकते हैं।" इतने में फल्गू नदी, गाय और केतकी के फूल तीनों इस बात से मुकर गए। सिर्फ वट वृक्ष ने सही बात कही। तब सीता ने दशरथ का ध्यान करके उनसे ही गवाही देने की प्रार्थना की।

दशरथ ने सीता की प्रार्थना स्वीकार कर घोषणा की कि ऐन वक्त पर सीता ने ही मुझे पिंडदान दिया है। इस पर राम आश्वस्त हुए, लेकिन तीनों गवाहों द्वारा झूठ बोलने पर सीताजी ने उनको क्रोधित होकर श्राप दिया कि फल्गू नदी, तू सिर्फ नाम की नदी रहेगी, तुझमें पानी नहीं रहेगा। इस कारण फल्गू नदी आज भी गया में सूखी रहती है। गाय को श्राप दिया कि तू पूज्य होकर भी लोगों का जूठा खाएगी और केतकी के फूल को श्राप दिया कि तुझे पूजा में कभी नहीं चढाया जाएगा। वट वृक्ष को सीताजी का आर्शीवाद मिला कि उसे लंबी आयु प्राप्त होगी और वह दूसरों को छाया प्रदान करेगा तथा पतिव्रता स्त्री तेरा स्मरण करके अपने पति की दीर्घायु की कामना करेंगी। यही कारण है कि गाय को आज भी जूठा खाना पडता है, केतकी के फूल को पूजा-पाठ में वर्जित रखा गया है और फल्गू नदी के तट पर सीताकुंड में पानी के अभाव में आज भी सिर्फ बालू या रेत से पिंडदान दिया जाता है।

Thursday, 25 August 2022

चित्रभानु

प्राचीन काल में चित्रभानु नाम का शिकारी था। किसी कारण वश वह एक साहूकार का कर्जदार हो गया। समय पर कर्ज चुकाने के कारण साहूकार ने चित्रभानु से कहा कि आज शाम तक अपना कर्ज चुका देना, नहीं तो अच्छा  होगा।

चिंतित चित्रभानु एक जंगल में शिकार करने के लिए गया। पूरा दिन खोजने के बाद भी चित्रभानु को शिकार नहीं मिला सूर्यास्त होने वाला था। शिकारी चित्रभानु ने सोचा कि अगर शिकार मिला तो साहूकार उसे सजा देगा, यही सोच कर चित्रभानु उसी जंगल में एक जलाशय के पास खड़े पेड़ पर चढ़ गया और शिकार का प्रतीक्षा करने लगा।

उस पेड़ के नीचे एक प्राचीन शिवलिंग था, जो कि बेल-पत्रो के सूखे पत्तों के कारण छीप गया था। संयोग से चित्रभानु के साथ यह घटना शिवरात्रि को हो रही थी। चित्रभानु ने पेड़ पर एक मचान बनाया, मचान बनाने के कारण पेड़ से कुछ बिल-पत्र निचे शिवलिंग पर गए। मचान बनाने के बाद चित्रभानु को बहुत प्यास लग गई थी इस कारण से चित्रभानु ने अपने पास रखे जल से अपनी प्यास बुझाई। जल पीते समय अचानक ही थोड़ा जल शिवलिंग पर गिर गया इसी प्रकार से चित्रभानु ने अनजाने में ही भगवान शिव कि पहले पहर की पूजा कर ली।

कुछ देर बाद एक हिरणी जल पीने के लिए जलाशय के पास आई, चित्रभानु ने अपना बाण धनुष पर चढ़ाया और जैसे ही धनुष की प्रत्यंचा खींची हिरणी ने शिकारी चित्रभानु को देखकर कहा, ‘’हे शिकारी मैं गर्भिणी हूँ कुछ समय बाद प्रसव करूँगी। तुम मुझे कुछ समय दे दो मैं प्रसव के बाद वापस तुम्हारे पास जाऊंगी।‘’

शिकारी चित्रभानु ने उस हिरणी की बात पर विश्वास कर उसे जाने दिया और वह हिरणी जंगली झाड़ियों में गायब हो गई। चित्रभानु ने अपना धनुष वापस ढीला कर लिया। धनुष ढीला करते समय अनायास ही बिल-पत्र टूट कर शिवलिंग पर गिर गए।

कुछ देर बाद एक मृग उसी जलाशय पर जल पीने आया और चित्रभानु ने फिर से अपना धनुष उठाया और ढीली प्रत्यंचा को फिर से कस लिया। मृग ने चित्रभानु को देख लिया और कहा, ‘’हे शिकारी तुम मुझे अभी मत मारो क्योंकि मेरी स्त्री गर्भिणी है, मुझे उसके पास जाना होगा वह बड़ी दयनीय अवस्था में होगी, मैं रहूंगा तो उसका हौसला बना रहेगा। मैं तुमसे वादा करता हूँ मेरी स्त्री के प्रसव के बाद मैं खुद चलकर तुम्हारे पास जाऊंगा।‘’ चित्रभानु ने उस मृग को जाने दिया। रात्रि का समय था, भुख प्यास से व्याकुल चित्रभानु ने जल पीने के लिए निकाला तो जल की कुछ बुन्दे बिल पत्र के साथ शिवलिंग पर गिर गए। इसी प्रकार से चित्रभानु की दूसरे पहर की पूजा भी हो गई।

रात्रि के तीसरे पहर एक हिरणी जलाशय के पास से गुजरी और चित्रभानु ने उसे मारने के लिए धनुष को तैयार किया। हिरणी ने शिकारी को देख कर कहा, "हे शिकारी मैं बहुत समय से अपने प्रियतम से नहीं मिली हूँ तुम मुझे कुछ समय दे दो, मैं अपने प्रियतम से मिल कर जल्दी ही जाऊंगी " शिकारी ने उसकी बात यह सोच कर मान ली कि जिस प्रकार से दो जीवों को जाने दिया उसी प्रकार से अगर यह भी चली जाएगी तो क्या फर्क पड़ जाएगा, चित्रभानु ने उसे भी जाने दिया। चित्रभानु के हिलने-ढुलने के कारण बिल पत्र के कुछ पत्ते फिर से शिवलिंग पर गिर गए। इस प्रकार से चित्रभानु की तीसरे पहर की पूजा भी हो गई।

चित्रभानु शिकार का प्रतीक्षा करते हुए बिल पत्र को तोड़ कर नीचे गिरा रहा था। वे सारे बिल पत्र शिवलिंग पर गिर रहे थे। अनजाने में चित्रभानु की चौथे पहर की पूजा भी समाप्त हो गई।

सूर्योदय होने वाला था। चित्रभानु ने देखा की अपने वादे के अनुसार मृग सपरिवार शिकारी चित्रभानु के पास गया और कहा, ‘’हे शिकारी अब तुम हमारा शिकार कर सकते।‘’

चित्रभानु ने जंगली पशुओं की ऐसी सत्यता, सामूहिक प्रेम भाव को देखकर बड़ी ग्लानि हुई। उसने मृग परिवार को जीवनदान दे दिया।

सूर्योदय हो जाने के कारण शिकारी पेड़ से नीचे उतरने लगा चित्रभानु ने नीचे की तरफ देखा तो उसे एक पाषाण दिखाई दिया। चित्रभानु ने उसी पाषाण पर पैर रख कर रहा था। जैसे ही चित्रभानु ने शिवलिंग पर पैर रखा की भगवान शिव वहां प्रकट हो गए और चित्रभानु से कहा, ‘’चित्रभानु मैं तुम्हारी पूजा से खुश हूँ, लोग मुझे जल-पत्र चढ़ाते है, लेकिन तुमने तो अपना पूरा शरीर ही मुझे चढ़ा दिया। मैं तुमसे प्रसन्न हूँ, मांगो क्या वरदान मांगते हो।

चित्रभानु ने कहा, ’’भगवन मैंने आपकी पूजा नहीं की मैं तो पूरी रात शिकार का प्रतीक्षा करता रहा।‘’ भगवान शिव ने कहा, ‘’चित्रभानु तुमने अनजाने में ही शिवरात्रि व्रत का पालन किया और मुझे जल-बिलपत्र चढ़ाया हैं। जो मुझ पर जल-बिलपत्र चढ़ाता है मैं उसके सारे पापों को नष्ट कर देता।‘’

भगवान शिव ने चित्रभानु को आशीष देकर कहा, ‘’चित्रभानु द्वापर युग में तुम एक गुरुद्रुह नाम के राजा बनोगे और भगवान राम की मित्रता तुम्हें मिलेगी।‘’

इस कथा को जो सुनता है या सुनाता है, भगवान भोले नाथ उसकी सभी मनोकामनाओं को पूरा करते हैं।


बाली

  बाली को ब्रम्हा जी से ये वरदान प्राप्त हुआ   की, 'जो भी उससे युद्ध करने उसके सामने आएगा ,  उसकी आधी ताक़त बाली के शरीर मे चली जायेगी , ...