प्राचीन काल में चित्रभानु नाम का शिकारी था। किसी कारण वश वह एक साहूकार का कर्जदार हो गया। समय पर कर्ज न चुकाने के कारण साहूकार ने चित्रभानु से कहा कि आज शाम तक अपना कर्ज चुका देना, नहीं तो अच्छा न होगा।
चिंतित चित्रभानु एक जंगल में शिकार करने के लिए गया। पूरा दिन खोजने के बाद भी चित्रभानु को शिकार नहीं मिला सूर्यास्त होने वाला था। शिकारी चित्रभानु ने सोचा कि अगर शिकार न मिला तो साहूकार उसे सजा देगा, यही सोच कर चित्रभानु उसी जंगल में एक जलाशय के पास खड़े पेड़ पर चढ़ गया और शिकार का प्रतीक्षा करने लगा।
उस पेड़ के नीचे एक प्राचीन शिवलिंग था, जो कि बेल-पत्रो के सूखे पत्तों के कारण छीप गया था। संयोग से चित्रभानु के साथ यह घटना शिवरात्रि को हो रही थी। चित्रभानु ने पेड़ पर एक मचान बनाया, मचान बनाने के कारण पेड़ से कुछ बिल-पत्र निचे शिवलिंग पर गए। मचान बनाने के बाद चित्रभानु को बहुत प्यास लग गई थी इस कारण से चित्रभानु ने अपने पास रखे जल से अपनी प्यास बुझाई। जल पीते समय अचानक ही थोड़ा जल शिवलिंग पर गिर गया इसी प्रकार से चित्रभानु ने अनजाने में ही भगवान शिव कि पहले पहर की पूजा कर ली।
कुछ देर बाद एक हिरणी जल पीने के लिए जलाशय के पास आई, चित्रभानु ने अपना बाण धनुष पर चढ़ाया और जैसे ही धनुष की प्रत्यंचा खींची हिरणी ने शिकारी चित्रभानु को देखकर कहा, ‘’हे शिकारी मैं गर्भिणी हूँ कुछ समय बाद प्रसव करूँगी। तुम मुझे कुछ समय दे दो मैं प्रसव के बाद वापस तुम्हारे पास आ जाऊंगी।‘’
शिकारी चित्रभानु ने उस हिरणी की बात पर विश्वास कर उसे जाने दिया और वह हिरणी जंगली झाड़ियों में गायब हो गई। चित्रभानु ने अपना धनुष वापस ढीला कर लिया। धनुष ढीला करते समय अनायास ही बिल-पत्र टूट कर शिवलिंग पर गिर गए।
कुछ देर बाद एक मृग उसी जलाशय पर जल पीने आया और चित्रभानु ने फिर से अपना धनुष उठाया और ढीली प्रत्यंचा को फिर से कस लिया। मृग ने चित्रभानु को देख लिया और कहा, ‘’हे शिकारी तुम मुझे अभी मत मारो क्योंकि मेरी स्त्री गर्भिणी है, मुझे उसके पास जाना होगा वह बड़ी दयनीय अवस्था में होगी, मैं रहूंगा तो उसका हौसला बना रहेगा। मैं तुमसे वादा करता हूँ मेरी स्त्री के प्रसव के बाद मैं खुद चलकर तुम्हारे पास आ जाऊंगा।‘’ चित्रभानु ने उस मृग को जाने दिया। रात्रि का समय था, भुख प्यास से व्याकुल चित्रभानु ने जल पीने के लिए निकाला तो जल की कुछ बुन्दे बिल पत्र के साथ शिवलिंग पर गिर गए। इसी प्रकार से चित्रभानु की दूसरे पहर की पूजा भी हो गई।
रात्रि के तीसरे पहर एक हिरणी जलाशय के पास से गुजरी और चित्रभानु ने उसे मारने के लिए धनुष को तैयार किया। हिरणी ने शिकारी को देख कर कहा, "हे शिकारी मैं बहुत समय से अपने प्रियतम से नहीं मिली हूँ तुम मुझे कुछ समय दे दो, मैं अपने प्रियतम से मिल कर जल्दी ही आ जाऊंगी " शिकारी ने उसकी बात यह सोच कर मान ली कि जिस प्रकार से दो जीवों को जाने दिया उसी प्रकार से अगर यह भी चली जाएगी तो क्या फर्क पड़ जाएगा, चित्रभानु ने उसे भी जाने दिया। चित्रभानु के हिलने-ढुलने के कारण बिल पत्र के कुछ पत्ते फिर से शिवलिंग पर गिर गए। इस प्रकार से चित्रभानु की तीसरे पहर की पूजा भी हो गई।
चित्रभानु शिकार का प्रतीक्षा करते हुए बिल पत्र को तोड़ कर नीचे गिरा रहा था। वे सारे बिल पत्र शिवलिंग पर गिर रहे थे। अनजाने में चित्रभानु की चौथे पहर की पूजा भी समाप्त हो गई।
सूर्योदय होने वाला था। चित्रभानु ने देखा की अपने वादे के अनुसार मृग सपरिवार शिकारी चित्रभानु के पास आ गया और कहा, ‘’हे शिकारी अब तुम हमारा शिकार कर सकते।‘’
चित्रभानु ने जंगली पशुओं की ऐसी सत्यता, सामूहिक प्रेम भाव को देखकर बड़ी ग्लानि हुई। उसने मृग परिवार को जीवनदान दे दिया।
सूर्योदय हो जाने के कारण शिकारी पेड़ से नीचे उतरने लगा चित्रभानु ने नीचे की तरफ देखा तो उसे एक पाषाण दिखाई दिया। चित्रभानु ने उसी पाषाण पर पैर रख कर रहा था। जैसे ही चित्रभानु ने शिवलिंग पर पैर रखा की भगवान शिव वहां प्रकट हो गए और चित्रभानु से कहा, ‘’चित्रभानु मैं तुम्हारी पूजा से खुश हूँ, लोग मुझे जल-पत्र चढ़ाते है, लेकिन तुमने तो अपना पूरा शरीर ही मुझे चढ़ा दिया। मैं तुमसे प्रसन्न हूँ, मांगो क्या वरदान मांगते हो।
चित्रभानु ने कहा, ’’भगवन मैंने आपकी पूजा नहीं की मैं तो पूरी रात शिकार का प्रतीक्षा करता रहा।‘’ भगवान शिव ने कहा, ‘’चित्रभानु तुमने अनजाने में ही शिवरात्रि व्रत का पालन किया और मुझे जल-बिलपत्र चढ़ाया हैं। जो मुझ पर जल-बिलपत्र चढ़ाता है मैं उसके सारे पापों को नष्ट कर देता।‘’
भगवान शिव ने चित्रभानु को आशीष देकर कहा, ‘’चित्रभानु द्वापर युग में तुम एक गुरुद्रुह नाम के राजा बनोगे और भगवान राम की मित्रता तुम्हें मिलेगी।‘’
इस कथा को जो सुनता है या सुनाता है, भगवान भोले नाथ उसकी सभी मनोकामनाओं को पूरा करते हैं।
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