हनुमान जी के मन्दिर में सवाकिलो लड्डू चढ़ा कर लौटते हुए सेठ गोवर्धनदाससे से उसके अंशुल ने गुब्बारे दिलवाने की जिद की। बच्चा पिट गया। वजह शायद बच्चे की जिद रही होगी या सवाकिलो के पुण्य का दम्भ इतना बढ़ गया होगा कि गोवर्धनदास सिर्फ उसी में बौराया था और उसका अंशुल के भाव से तारतम्य टूट गया हो। या फिर वह अपनी ही उलझनो से इतना बोझिल था कि उसका ईश्वर के घर आ कर भी गुस्से पर काबू ना रहा।
सुयोग गुब्बारे वाले के पास बहुत भीड थी, भीड़ में से भी उसकी नजर पिटते बच्चे पर जा पड़ी। बच्चा रो रहा था और भक्त पिता बच्चे को डांटे जा रहा था। सुयोग अंशुल की ओर आया और एक गुब्बारा उसके हाथ में पकड़ा दिया। गोवर्धनदास ग़ुस्से में तो था ही। वह सुयोग से उलझ पड़ा । "तुम मौके की ताड मे रहा करो बस, कोई बच्चा तुम्हे जिद करता दिख जाए बस। झट से पीछे लग जाते हो। नही लेना गुब्बारा।" और गोवर्धनदासने ने सुयोग गुब्बारे वाले को बुरी तरह झिडक दिया।
सुयोग अंशुल के हाथ में गुब्बारा पकड़ाते हुए बोला-" मैं यहाँ गुब्बारे बेचने नही आता, बांटने आता हूं। किसी दिन मुझे किसी ने बोध करवाया कि ईश्वर बच्चों में भी तो है, मैं हर मंगलवार सौ रूपये के गुब्बारे लाता हूँ। इनमे खुद ही हवा भरता हूं। एक गुब्बारा मंदिर मे बाँध आता हूं बाकि सब यहाँ बच्चों मे बाँट देता हूँ। मेरा तो यही प्रसाद हैं। हनुमान जी स्वीकार करते होंगे यही मानता हूँ ।
सेठ गोवर्धनदास को सवा किलो लड्डू का बड़ा पुण्य एकाएक छोटा लगने लगा।
कहानी अंततक पढ़ी इसलिए धन्यवाद। मेरे अन्य ब्लोग्स फॉलो करे लिंक्स निचे दी गयी है।
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