एक अन्य कथा के अनुसार दुर्वशा ऋषि ने देवलघाट नामक स्थान पर बीच ताप्ती नदी में स्थित एक चटटन के नीचे से बने सुरंग द्वार से स्वर्ग को प्रस्थान किया था. शास्त्रो में कहा गया है कि यदि भूलवश या अनजाने से किसी भी मृत देह की हडड्ी ताप्ती के जल में प्रवाहित हो जाती है तो उस मृत आत्मा को मुक्ति मिल जाती है.
जिस प्रकार महाकाल के दर्शन करने से अकाल मौत नहीं होती ठीक उसी प्रकार किसी भी अकाल मौत के शिकार बनी देह की अस्थियां ताप्ती जल में प्रवाहित करने या उसका अनुसरण करके उसे ताप्ती जल में प्रवाहित किये जाने से अकाल मौत का शिकार बनी आत्मा को भी प्रेत योनी से मुक्ति मिल जाती है.
ताप्ती नदी के
बहते जल में बिना किसी विधि - विधान के यदि कोई भी व्यक्ति अतृप्त आत्मा को आमंत्रित करके उसे अपने दोनो हाथो में जल लेकर उसकी शांती एवं तृप्ति का संकल्प लेकर यदि उसे बहते जल में प्रवाहित कर देता है तो मृत व्यक्ति की आत्मा को मुक्ति मिल जाती है.
सबसे चमत्कारिक
तथ्य यह है कि ताप्ती के
पावन जल में बारह माह
किसी भी मृत व्यक्ति का तर्पण कार्य संपादित किया जा सकता है. इस तर्पण कार्य को ताप्ती जन्मस्थली मुलताई में गायत्री परिवार द्वारा नि:शुल्क संपादित किया जाता है.
ताप्ती नदी के जल
में मुलताई से लेकर सूरत
गुजरात तक कोई भी
व्यक्ति किसी भी धर्म -
जाति - सम्प्रदाय - वर्ग
का अपने किसी भी परिजन या परिचित व्यक्ति की मृत आत्मा का तर्पण कार्य संपादित कर सकता है.
सूर्यपुत्री मां
ताप्ती भारत की पश्चिम दिशा में
बहने वाली प्रमुख दो
नदियो में से एक है. यह
नाम ताप अर्थात उष्ण
गर्मी से उत्पन्न हुआ है.
वैसे भी ताप्ती ताप -
पाप - श्राप और त्रास
को हरने वाली आदीगंगा
कही जाती है. स्वंय
भगवान सूर्यनारायण ने
स्वंय के ताप को कम
करने के लिए ताप्ती को
धरती पर भेजा था.
यह सतपुड़ा पठार पर स्थित मुलताई के तालाब से उत्पन्न हुई है लेकिन इसका मुख्य जलस्त्रोत मुलताई के उत्तर में 21 अंक्षाश 48
अक्षंाश पूर्व में 78 अंक्षाश एवं 48 अंक्षाश में स्थित 790 मीटर ऊँची पहाड़ी है जिसे प्राचिनकाल में ऋषिगिरी पर्वत कहा जाता था जो बाद में नारद टेकड़ी कहा जाने लगा . इस स्थान पर स्वंय ऋषि नारद ने घोर तपस्या की थी तभी तो उन्हे ताप्ती पुराण चोरी करने के बाद उत्पन्न कोढ़ से मुक्ति का मार्ग ताप्ती नदी में स्नान का महत्व बताया गया था. मुलताई का नारद कुण्ड वही स्थान है जहाँ पर नारद को स्नान के बाद कोढ़ से मुक्ति मिली थी.
ताप्ती नदी
सतपुड़ा की पहाडिय़ो एवं
चिखलदरा की घाटियो को
चीरती हुई महाखडड में
बहती है. 201 किलोमीटर अपने मुख्य जलस्त्रोत से बहने के बाद ताप्ती पूर्वी निमाड़ में पहँुचती है.
पूर्वी निमाड़
में भी 48 किलोमीटर सकरी घाटियो का सीना चीरती ताप्ती 242 किलोमीटर का सकरा रास्ता खानदेश का तय करने के बाद 129 किलोमीटर पहाड़ी
जंगली रास्तो से कच्छ क्षेत्र में प्रवेश करती
है. लगभग 701 किलोमीटर लम्बी ताप्ती नदी में सैकड़ो कुण्ड एवं जल प्रताप के साथ डोह है जिसकी लम्बी खाट में बुनी जाने वाली रस्सी को डालने के बाद भी नापी नही जा सकी है.
इस नदी पर यूँ तो आज तक कोई भी बांध स्थाई रूप से टिक नही सका है मुलताई के पास बना चन्दोरा बांध इस बात का पर्याप्त आधार है कि कम जलधारा के बाद भी वह उसे दो बार तहस नहस कर चुकी है. सूरत को बदसूरत करने वाली ताप्ती वैसे तो मात्र स्मरण मात्र से ही अपने भक्त पर मेहरबान हो जाती है लेकिन किसी ने उसके अस्तित्व को नकारने की कुचेष्टïा
की तो वह फिर शनिदेव की बहन है
कब किसकी साढ़े साती कर
दे कहा नही जा सकता.
ताप्ती नदी के
किनारे अनेक सभ्यताओं ने जन्म लिया और वे विलुप्त हो गई.
भले ही आज ताप्ती घाटी
की सभ्यता के
पर्याप्त सबूत न मिल
पाये हो लेकिन ताप्ती के
तपबल को आज भी कोई
नकारने की हिम्मत
नही कर सका है.
पुराणो में लिखा
है कि भगवान जटाशंकर भोलेनाथ की जटा से निकली भागीरथी गंगा मैया में सौ बार स्नान का,
देवाधिदेव महादेव के
नेत्रो से निकली एक
बुन्द से जन्मी शिव
पुत्री कही जाने
वाली माँ नर्मदा के
दर्शन का तथा माँ ताप्ती के
नाम का एक समान पूण्य
एवं लाभ है.
वैसे तो जबसे से इस सृष्टिï का निमार्ण हुआ है तबसे मूर्ति पूजक हिन्दू समाज नदियों को देवियों के रूप में सदियों से पूजता चला आ रहा है. हमारे धार्मिक गंथो एवं वेद तथा पुराणो में भारत की पवित्र नदियों में ताप्ती एवं पूर्णा का भी उल्लेख मिलता है.
सूर्य पुत्री ताप्ती अखंड भारत के केन्द्र बिन्दु कहे जाने वाले मध्यप्रदेश के बैतूल जिले के प्राचीन मुलतापी जो कि वर्तमान में मुलताई कहा जाता है,
इस मुलताई नगर स्थित तालाब से
निकल कर समीप के गौ मुख
से एक सुक्ष्म धार
के रूप में बहती हुई
गुजरात राज्य के सूरत के पास
अरब सागर में समाहित हो
जाती है.
सूर्य देव की लाड़ली बेटी एवं शनिदेव की प्यारी बहना ताप्ती जो कि आदिगंगा के नाम से भी प्रख्यात है वह आदिकाल से लेकर अनंत काल तक मध्यप्रदेश ही नहीं बल्कि महाराष्टï्र
एवं गुजरात के विभिन्न
जिलों की पूज्य
नदियों की तरह पूजी जाती
रहेगी. जिसका एक
कारण यह भी है कि सूर्यपुत्री ताप्ती मुक्ति का सबसे अच्छा माध्यम है.
सबसे आश्चर्य जनक
तथ्य यह है कि सूर्य पुत्री ताप्ती की सखी
सहेली कोई और न होकर चन्द्रदेव की पुत्री पूर्णा है जो की उसकी सहायक नदी के रूप में जानी - पहचानी जाती है . पूर्णा नदी भैंसदेही नगर के पश्चिम दिशा में स्थित काशी तालाब से निकलती हैं. प्रतिवर्ष लाखों की संख्या में श्रद्घालु लोग अमावस्या और पूर्णिमा के समय इन नदियों में नहा कर पूर्ण लाभ कमाते हैं.
एक किवदंती कथाओं के अनुसार सूर्य और चन्द्र दोनों ही आपस में एक दूसरे के विरोधी रहे हैं, तथा दोनों एक दूसरे को फूटी आँख नहीं
सुहाते हैं. ऐसे में दोनों की पुत्रियों का अनोखा मिलन
बैतूल जिले में आज भी लोगों की श्रद्घा का
केन्द्र बना हुआ हैं.
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