Tuesday, 5 July 2022

कष्ट निवारक सुरक्षा कवच

प्रणम्य शिरसा देवं गौरी विनायकम्।

भक्तावांस स्मेर नित्यप्राय: कामार्थसिद्धये।। 1।।

प्रथमं वक्रतुडं च एकदंत द्वितीयकम्।

तृतियं कृष्णपिंगात्क्षं गजववन्नं चतुर्थकम्।।2।।

लंबोदरं पंचम च पष्ठं विकटमेव च।

सप्तमं विघ्नराजेंद्रं धूम्रवर्ण तथाष्टमम्।। 3।।

नवमं भाल चंद्रं च दशमं तु विनायकम्।

एकादशं गणपङ्क्षत द्वादशं तु गजानन्।।4।।

द्वादशैतानि नमानि त्रिसंध्यंय: पठेन्नर:।

न च विघ्नभयं तस्य सर्वसिद्धिकरं प्रभो।।5।।

विद्यार्थी लभते विद्यां धनार्थी लभते धनम्।

पुत्रार्थी लभते पुत्रान्मोक्षार्थी लभते गतिम्।।6।।

जपेद्णपतिस्तोत्रं षडिभर्मासै: फलं लभते।

संवत्सरेण सिङ्क्षद्धच लभते नात्र संशय:।।7।।

अष्टभ्यो ब्राह्मणे भ्यश्र्च लिखित्वा फलं लभते।

तस्य विद्या भवेत्सर्वा गणेशस्य प्रसादत:।।8।।

इति श्री नारद पुराणे संकष्टनाशनं नाम श्री गणपति स्तोत्रं संपूर्णम्।। 


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